जन्म से पहले, मृत्यु के बाद

सुनहु राम स्वामी सन चल न चतुरी मोरि।

प्रभु अजहुँ मैं पापी अंतकाल गति तोरी।।

~ संत तुलसीदास

आचार्य प्रशांत: विचित्र लीला है। कहीं से आते नहीं हम और न कहीं को चले जाते हैं। मध्य में वो है जिसे हम कहते हैं कि ‘हम’ हैं। जन्म से पहले तुम कौन थे और कहाँ थे? और मौत के बाद तुम कौन होओगे और कहाँ होओगे? और बीच में तुमने खूब खेल रचाया है! बीच में तुम कहते हो, “मैं हूँ, मैं…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org