चार-पाँच औरतों से एक साथ प्यार!

क्या फर्क़ पड़ता है कि तुम एक के साथ हो या पाँच के साथ हो? तुम एक के साथ थे तो भी अतृप्त थे, पाँच के साथ थे, तो भी अतृप्त थे, तुम पाँच-हज़ार कर लो तुम तब भी खाली ही रहोगे। हम किसी के पास बाँटने के लिए थोड़े ही जाते हैं, हम तो लेने के लिए जाते हैं; नोचने, खसोटने, चूसने, निचोड़ने के लिए जाते हैं। और दूसरे से तुम्हें जो मिलना है वो कभी काफी पड़ना नहीं है। तो एक का शोषण कर लोगे फिर दूसरी के पास जाओगे या दूसरे के पास जाओगे, फिर तीसरे के पास…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org