चलना काफी है

मारग चलते जो गिरे, ताको नाही दोस । कहै कबीर बैठा रहे, ता सिर करड़ै कोस ॥ -कबीर

वक्ता: जो चलते हुए गिरता है उसका दोष नहीं है, जो बैठा रहता है उसके सिर पर कोटिक पाप हैं। क्या कह रहे हैं कबीर? आप क्लास लेने जाते हो, वहाँ कोई तीन छात्र बैठे हैं। तीनों का पहला सेशन है। अगले दिन तीनों ही सेशन में अनुपस्थित हो जाते हैं। आप पता करते हो की बात क्या है, की आए क्यों नहीं।

पहला बोलता है, ‘मैं इसलिए नहीं आया क्योंकि आप जो कुछ बताने जा रहे हो, वो मुझे पहले से पता है’। दूसरा कहता है, ‘मैं इसलिए नहीं आया, क्योंकि आपने जो कुछ कहा वो मुझे कुछ समझ में ही नहीं आया। जब मुझे समझमे ही नहीं आया, तो आने से फायदा क्या?’ तीसरा कहता है, ‘मैं इसलिए नहीं आया क्योंकि जो आप कहते हो, मुझे समझ में तो सब आता है पर मैं वो कर नहीं पाऊंगा’। इन तीनों में क्या भेद है?

श्रोता १: ये जो तीसरा है, हम उसको दोष नहीं दे सकते।

वक्ता: ये तीनों एक ही भूल कर रहे हैं, जो आध्यात्म के जगत में मूल भूल है, उसके अलावा यहाँ कोई भूल होती नहीं। वो भूल ये है कि ‘मैं सब कुछ करूँगा, सब देखूँगा, बुद्धि का पूरा प्रयोग करूँगा, अपने को बचाते हुए। मैं जो हूँ, उस पर आँच नहीं आने दूँगा। आत्म-चिंतन कभी नहीं करूँगा, अपनी दृष्टि को अपनी ओर कभी नहीं मुड़ने दूँगा। मैं जो हूँ, उसको तो कायम रहना ही होगा। मुझे स्वयं को बदलना नहीं है, किसी भी हालत में बदलना नहीं है’।

‘मैं डरा हुआ हूँ, मुझे लगता है कि मेरी जो पहचान है, मैं जो हूँ, वही मैं हूँ, और अगर वो मैं नहीं रहा, तो मैं मिट जाऊँगा। मैं बहुत डरा हुआ हूँ’। ऐसा व्यक्ति कभी शांत होकर आत्म-चिंतन नहीं कर सकता। ऐसे व्यक्ति के पास आप सब कुछ पाएंगे, पर मौन नहीं पाएंगे। उसका मन कभी समाधि की ओर नहीं जाना चाहेगा, कभी शांत, बिल्कुल शांत नहीं होना चाहेगा। आवाक कभी ये हो ही नहीं पाएगा।

इसकी हालत उस आदमी जैसी होगी जो दुनिया की सुन्दरतम पर्वत-श्रृंखला के सामने खड़ा हो, और पास में एक खूबसूरत नदी बह रही हो, और अचानक से सूर्योदय हुआ हो, सूर्य की पहली किरण दिख रही हो, और ये अपने बगल वाले से कहे, ‘अरे, चिप्स का पैकेट कहाँ है? ज़रा चिप्स देना’। और चिप्स का पैकेट लेकर कहे, ‘किस कंपनी का है? कहाँ से आ रहा है?’ वो ये सब कुछ करेगा जो मौन को तोड़ दे, जो समाधि को तोड़ दे क्योंकि इसे ख़ुद को कायम रखना है। मौन आपको तोड़ देता है। आप मौन पसंद नहीं करेंगे, आप उसे भंग करना चाहेंगे।

एक बात आपने तय ही कर रखी है- हम बदलें न। और आपको बहुत दोष दिया भी नहीं जा सकता क्योंकि आपको शायद ख़ुद भी ये नहीं पता है कि आपने ये कब तय किया। आपको शायद ख़ुद भी नहीं पता है कि आपकी मूल-वृति अहम-वृत्ति है, जो ‘अहम’ को कायम रखना चाहती है, ‘मैं’ को कायम रखना चाहती है। ‘मैं जो हूँ, वो बचा रहे’, उसी का अर्थ होता है, ‘बैठ जाना’।

आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org