गुलामी चुभ ही नहीं रही, तो आज़ादी लेकर क्या करोगे?

बाहरी व्यवस्था सिर्फ़ बाहरी थोड़ी है, अगर व्यवस्था की उपेक्षा करने के पीछे तुम्हारी नियत ये है कि तुम बंधना नहीं चाहते किसी ऐसी चीज़ में जो निजी नहीं है, जो तुम्हारी आत्मिक नहीं है तो जो चीज़ आत्मिक नहीं है वो सिर्फ़ बाहर की व्यवस्था में ही थोड़े ही बैठी है, वो भीतर भी तो प्रवेश कर गई है। जिसको तुम भीतरी बोलते हो वो भी बाहरी है।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org