गुरु से सीखें या जीवन के अनुभवों से?

गुरु से सीखें या जीवन के अनुभवों से?

इदमिदमिति तृष्णयाऽभिभूतं जनमनवाप्तधनं विषीदमानम् ।

निपुणमनुनिशाम्य तत्त्वबुद्ध्या व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ।।

जो ये मिले, वो मिले — इस तरह तृष्णा से दबे रहते हैं और धन न मिलने के कारण निरंतर विषाद करते हैं, ऐसे लोगों की दशा अच्छी तरह देख कर तात्विक बुद्धि से संपन्न हुआ मैं पवित्र भाव से इस आजगर-व्रत का आचरण करता हूँ।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org