गहराई की तो बात ही दूसरी है!

मन को ऊपर-ऊपर से देखो तो अशांत होता है, और गहराई में देखो तो शांत है। मन ऊपर-ऊपर से देखो तो ‘मन’ है, और गहराई में देखो तो ‘आत्मा’ है। अब दोनों एक साथ हैं या नहीं? लहरें भी हैं और स्थिरता भी है। और सागर जितना गहरा होता है, नीचे उसमें उतनी शांति होती है। और उसी में ज़रा ऊपर आ जाओ, तो लहरें भी चल रही हैं, और ये भी हो रहा है, और वो भी हो रहा है।

ऊपर-ऊपर से जिस भी चीज़ को देखोगे, उसमें इसी तरीक़े से कुछ-न-कुछ उतार-चढ़ाव दिखाई देंगे। और तुम्हारे लिए बहुत आसान होगा ये कह देना कि — “यहाँ शांति नहीं है।” और तुम्हें ऊपर-ऊपर से देखकर ही अगर चीज़ों को ठुकराना है, तो तुम हर चीज़ को ठुकरा सकते हो। शांति तो हमेशा ज़रा गहराई में मिलती है। और गहराई में जाओगे, तो सब कुछ शांत है।

गहराई में कभी हवाएँ पहुँचती हैं बाहर से? गहराई में कोई बाहर वाला प्रवेश कर सकता है? किसी की हिम्मत है कि जाकर गहराईयों में भूचाल ला दे?

तुम जितने उथले होओगे, उतनी आसानी से बाहर वाले तुम में कम्पन ला देंगे।

और तुम जितने गहरे होओगे, बाहर वालों के लिए उतना मुश्किल होगा तुम्हारी गहराइयों को विचलित कर देना।

हाँ, ऊपर-ऊपर से तुम्हें विचलित कर सकता है कोई भी। ऊपर-ऊपर से विचलित होना तो ठीक है। महासागर भी हो, उसपर भी तुम अगर ज़रा-सी फूँक मार दो, तो क्या होगा? महासागर है, और तुम सतह के पास जाकर उसपर अगर ज़रा-सी फूँक मार दो, तो क्या होगा?

ज़रा-सा प्रभाव तो पड़ ही जाएगा। लेकिन गहराई की तो बात ही दूसरी है।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org

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