खुद जग जाओ, नहीं तो ज़िंदगी पीट कर जगाएगी

प्रश्न: आचार्य जी, आज दिन भर तमस हावी रहा है। मैं देख रहा था कि उसपर मेरा वश चल नहीं पा रहा था ज़्यादा। कभी देख पा रहा था, कभी लुढ़क रहा था, और कभी उठा रहा था ख़ुद को। ये लगातार चलने वाली प्रक्रिया है या कुछ और है?

आचार्य प्रशांत: देखो बेटा, शरीर तो होता है जड़। ठीक है? तमसा शरीर की तो होती नहीं। कोई कुछ भी बोले कि लोग तीन तरह के होते हैं, या लोगों ने जो भोजन कर लिया होता है वो तीन तरह का होता है…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org