क्यों रचा गया वेदांत?

प्रश्नकर्ता: वेदान्त क्यों रचा गया?

आचार्य प्रशांत: ऋषियों का एक-एक शब्द सुनने वाले बेचैन मन की शान्ति हेतु ही है। यही एकमात्र उद्देश्य है उपनिषदों का। एक-एक बात जो कही जा रही है वह किसी अवस्था विशेष से कही जा रही है; सत्य, अनावलंबित सत्य, निरुद्देश्य सत्य, निष्प्रयोजन सत्य, कहा ही नहीं जा सकता। जो कुछ कहा जाता है वह सदा किसी सीमित इकाई के लाभ हेतु कहा जाता है। असीम सत्य को शब्दों में वर्णित करने का कोई उपाय नहीं है। उपनिषदों में भी जो कहा गया है वह मन के लाभार्थ कहा गया है। वैसे ही उसको देखना होगा। सत्यता मत ढूँढिएगा, उपयोगिता देखिएगा।

‘सत्य या ब्रह्म से श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं’, यह वाक्य बहुत औचित्यपूर्ण नहीं होगा क्योंकि सत्य या ब्रह्म के अतिरिक्त दूसरा कोई है ही नहीं, जब दूसरा कोई है ही नहीं तो दूसरा कोई श्रेष्ठ या हीन कैसे हो सकता है? तो यह बात इसीलिए किसी पूर्ण या मुक्त संदर्भ में नहीं कही गई है, यह बात मन के सीमित संदर्भ में कही गई है। मन ही है जिसको बहुत सारे दिखाई देते हैं, जिसके लिए वैविध्यपूर्ण संसार है, जिसके सामने हज़ारों-करोड़ों भिन्न-भिन्न इकाइयाँ हैं, और उन इकाइयों में वह किसी को श्रेष्ठ समझता है और किसी को हीन। तुम्हारे लिए ब्रह्म से श्रेष्ठ कोई दूसरा नहीं। ब्रह्म से श्रेष्ठ कोई दूसरा कैसे हो जाएगा? सबकुछ तो ब्रह्म के भीतर है। जो पूर्ण है उससे श्रेष्ठ अंश कैसे हो जाएगा? पूर्ण की तुलना आप किस से करेंगें? जिस तुला पर आप पूर्ण को नापेंगे-जोखेंगे, उसका मूल्य या वज़न करेंगे, वह तुला भी पूर्ण के अंदर ही है। पूर्ण का अर्थ ही है जिसमें सब कुछ समाहित हो, तो तुलना का कोई उपाय नहीं।

पर अगर हम बहुत सावधान होकर के इस बात को नहीं समझेंगे तो हमारे मन में जानते हैं छवि कैसी आएगी? हमारे मन में छवि आएगी कि बहुत सारी इकाइयाँ हैं इस संसार में, ब्रह्म भी उनमें से कोई एक इकाई है, थोड़ी खास इकाई है, उच्च इकाई है, श्रेष्ठ इकाई है, श्रेष्ठतम इकाई है, लेकिन है तो इसी संसार की एक इकाई ही ब्रह्म। ऐसी हमारे मन में भावना, धारणा आएगी अगर हमने यह सोचा कि ऋषि कह रहें हैं कि बात ब्रह्म की संसार की दूसरी इकाइयों से तुलना से है।

नहीं, संसार की दूसरी इकाईयों से ब्रह्म की तुलना नहीं की जा रही, क्योंकि ब्रह्म संसार की कोई इकाई है ही नहीं। तो इसको कैसे पढ़ना है? ऐसे नहीं कहना है कि ब्रह्म सर्वश्रेष्ठ है, ऐसे नहीं पढ़ना है कि ब्रह्म से श्रेष्ठ कोई अन्य नहीं। इसको पढ़ना है, ‘मेरे लिए ब्रह्म से श्रेष्ठ कोई अन्य नहीं।’ क्योंकि सारी बात किससे कही गई है? तुमसे। मुझे मालूम है मैं यह बात इतनी बार दोहराता हूँ, आप इससे ऊब भी सकते हो, पर तुम्हारा ऊब जाना कम नुकसान की बात होगी, मूल संदर्भ को भूल जाना ज़्यादा नुकसान की बात होगी, तो मैं दोहराता रहूँगा।

--

--

आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org