क्या सिखाना चाहती है कोरोना महामारी?

प्रकृति का क्रूर दोहन,
विकास की खोखली परिभाषा,
उपभोग की अंतहीन कामना,
ये आम आदमी का जीवन है।
सब देशों-समाजों का अंधा आदर्श है।

जिस राह हम चल रहे हैं,
भीतर से तो रोज़ मर ही रहे थे,
अब बाहर भी मौत नाच रही है।

बाहर तो शायद वैक्सीन काम आ जाए, पर भीतर का रोग?

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org