क्या सामाजिक रह करके भी मन अपना रह सकता है?

जब तुम कहते हो कि क्या सामाजिक रह कर भी मन को काबू कर सकते हैं, तो तुम यूँ पूछते हो जैसे कि तुम्हारे पास कोई विकल्प है, जैसे कि दोनों रास्ते तुम्हें खुले हुए हैं कि मैं सामाजिक रह भी सकता हूँ और जब चाहूँ मैं समाज से कट भी सकता हूँ। ये विकल्प है क्या तुम्हारे पास? तुम्हें लगता ज़रूर है कि तुम समाज से हट जाओगे पर समाज से हटने के लिए जो चित्त चाहिए, जो मन चाहिए, जो हिम्मत और श्रद्धा चाहिए वो क्या है तुम्हारे पास? तुम…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org