क्या प्रेम किसी से भी हो सकता है?

प्रश्नकर्ता (प्र): आचार्य जी, क्या प्रेम किसी से भी हो सकता है?

आचार्य प्रशांत (आचार्य): एक व्यक्ति वह होता है जो किसी और से कोई संबन्ध रख ही नहीं सकता क्योंकि वह बहुत स्वकेंद्रित होता है। यह मन का सबसे निचला तल है, स्वकेंद्रित मन। वह किसी से कोई रिश्ता रख ही नहीं सकता। उसके जो भी रिश्ते होंगें वह होंगें भी मतलब परस्त। वह बहुत छुपाना भी नहीं चाहेगा कि वह सिर्फ स्वार्थ देख पाता है। उसे बस काम निकालना है। और वह सारे काम उसके अपने हैं भी नहीं। वह सारे काम उसके संस्कारों और उसके ढाँचों, उसके ढर्रों द्वारा निर्देशित हैं। जो कुछ उसे सिखा दिया गया है, जो कुछ उसके रक्त में बह रहा है, जो कुछ उसको शरीर ने और समाज ने दिया है इसको वह समझ लेता है अपना काम, अपना हित, अपना प्रयोजन। और उसकी पूर्ति के लिए वह निर्भर रहता है मात्र अपने आप पर, दूसरा उसके लिए अधिक से अधिक ज़रिया बन सकता है। यह सबसे निचले तल का मनुष्य है, सबसे निचले तल का मन है।

इससे ऊपर वह मन आता है जो किसी का हो जाता है, जो कहता है मैं इस ‘एक’ का हुआ। इस ‘एक’ से मैंने नाता जोड़ा, गाँठ बाँधी। वह कहता है मैं वफादार हूँ। वह कहता है मैं एक का हूँ। वह कहता है पूरी दुनिया में से कोई एक चुन लिया, पकड़ लिया या संयोगवश सामने आ गया और अब इससे कभी न टूटने वाला संबन्ध बन गया और जो यह संबन्ध है यह निश्चित रूप से विभाजनकारी है, इस अर्थ में कि एक से बना है तो अब दूसरों से बन नहीं सकता। एक के हो गए हैं और उस एक के होने का अर्थ ही यह है कि दूसरों को अब उतनी ही आत्मीयता की दृष्टि से देख नहीं सकते।

जिसे हम आमतौर पर सम्बन्धों में समर्पण कहते हैं या वफ़ा कहते हैं उसका अर्थ ही यही होता है कि तुमने अब सीमारेखा खींच दी। तुमने कह दिया कि, “सीमा के इस पार यह जो एक है या दो-तीन हैं यह तो मेरे प्रियजन हैं, मेरा परिवार है, कुटुंब और कुनबा है और इसके बाहर जो कुछ है वह गैर है। वह दूसरे हैं। अब ये भीतर वाले मुझे प्रिय हैं और इनका मतलब साधने के लिए, इनके स्वार्थों की परिपूर्ति के लिए अगर बाहर वालों का शोषण भी करना पड़े तो मैं करूँगा। यदि बाहर वालों का शोषण करके मुझे रिश्वत लेनी पड़े तो मैं लूँगा ताकि मेरा अपना परिवार सुखी रह सके। मुझे पूरी दुनिया में दुख भी फैलाना पड़े तो मैं फैलाऊँगा ताकि जिन्हें मैं अपना कहता हूँ, मेरे वो अपने प्रसन्न रह सकें।” यह वो मन है जो कहता है कि कोई एक मेरा है और बाकी पराए। यह दूसरे तल का मन था।

पहले तल का मन, हमने कहा, स्वकेंद्रित। दूसरे तल का मन हमने कहा वह जो किसी एक को समर्पित हो गया है।

पहले तल के मन को तो समाज भी स्वीकृति नहीं देता। दूसरे तल के मन की समाज भूरी-पूरी प्रशंसा करता है। समाज कहता है इससे बढ़िया कुछ हो नहीं सकता। इस मन से समाज में सुव्यवस्था कायम रहती है। सब कुछ तयशुदा रहता है, गणित जैसा। एक के साथ एक, एक के साथ एक, एक के साथ एक और जो एक के साथ लग गया अब वह कभी किसी दूसरे की ओर नज़र…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org