क्या प्रेम एक भावना है?

प्रश्नकर्ता: काम को ले कर मैं पूरा श्रम नहीं करता; पता होते हुए भी नहीं करता। जैसे नींद आती है पढ़ाई के समय। एक तरह की बेईमानी भी है। उस काम में मेरी पूरी रुचि नहीं होने का एक कारण यह भी रहा है कि वो चीज़ मूल्यहीन लगती रही है और इस वजह से बचपन से ही कष्ट पाया है, और कष्ट पाते हुए भी कोई बदलाव नहीं ला पाया। लेकिन जब से अध्यात्म में प्रवेश किया, ये मुझे नहीं छोड़ता; बाकी चीज़ों को मैंने छोड़ा है, लेकिन ये मुझे ही नहीं छोड़ता। हमने कबीर साहब की बात की, तब कहा गया कि भाव और प्रेम, दोनों में फर्क है। तो भाव और प्रेम में क्या फर्क है?

आचार्य प्रशांत: काम अगर ऐसा नहीं है कि तुम्हारी नींद उड़ा दे, तो उसको चुनना तुम्हारी भूल है। नींद को दोष मत दो, नींद तो प्राकृतिक है। अहम् को कुछ तो भोगना है न? वो नींद को भी भोगता है। कहते हो न? “सो लिए अच्छा लग रहा है।” तो हमने सोने की अवस्था को भी क्या करा? भोगा। सोने से बेहतर कुछ मिल जाता तो नहीं सोते तुम। रातों की नींद उड़ी है न जब नींद से ज़्यादा महत्वपूर्ण कुछ मिल गया है? आम तौर पर हमें जो ज़्यादा महत्वपूर्ण मिला होता है नींद से, वो नींद से बदतर ही होता है। डर के मारे नहीं सोते, चिंता के मारे नहीं सोते, चोरी के मारे नहीं सोते, या वासना के मारे नहीं सोते; लेकिन साधक भी नहीं सोते रात में। रात में जगता हुआ पाओ, तो चोर होगा, कामी होगा, और ये भी संभावना है कि कोई साधक हो, और साधक माने यही नहीं कि कोई बैठ कर के, आँख बंद कर के ध्यान कर रहा है; कोई रात भर बैठ कर पुस्तकालय में पढ़ रहा है तो साधक ही हुआ न? वो भी जगते हैं रात भर।

अपने आप को कुछ ऐसा दे दो जिससे नींद ही उड़ जाए, भूख प्यास का अता-पता भूल जाओ; वो नहीं दे रहे हो और फिर तुम दोष दो भूख को और नींद को तो ये बात ठीक नहीं है।

भूख और नींद चेतन तो है नहीं, शरीर की माँग होते हैं; सोओगे नहीं तो ये शरीर ही झड़ जाएगा। तीन-चार दिन खाना-पीना न मिले, तो झेल लोगे; तीन-चार दिन नींद न मिले तो पगला जाओगे; शारीरिक चीज़ है, नींद का दोष नहीं। अपने आप को कुछ बहुत ऊँचा देना पड़ता है, कुछ बहुत आकर्षक देना पड़ता है।

अब आते हैं तुम्हारे दूसरे प्रश्न पर कि प्रेम और भाव में क्या अंतर है। प्रेम और भाव में समानता कहाँ दिख रही है? पहले तो ये बताओ। प्रेम का अर्थ ही होता है, भावों के प्रति आकर्षण छोड़ देना। भाव होते हैं सब दुनियादारी के, और प्रेम होता है दुनिया के पार का आकर्षण। भाव तुम्हारे भीतर की मिट्टी से उठे हैं, और उसी मिट्टी को प्रोत्साहन देते हैं। प्रेम निर्मम होता है; वो मिट्टी को झाड़ देता है, बिलकुल बेरहमी से; वो कहता है “एक ही है जिसकी ओर जाना है।” ‘पिया तोसे नैना लागे रे’ (ऊपर की ओर इंगित करते हुए) और बाकी ये सब मिटटी-टट्टी, इनसे थोड़ी ही दिल लगाना है। भाव किसी…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org