क्या पुनर्जन्म होता है?

तुम जो कुछ हो, उसका कोई पुनर्जन्म नहीं होता।

तुम्हारा कोई पुनर्जन्म नहीं होता।

जहाँ तक आत्मा के पुनर्जन्म की बात है, वो पुनर्जन्म नहीं है।

वो खेल है, वो लीला है।

या तो कह दो कि -“आत्मा का न कोई जन्म है न कोई मृत्यु,” या ये कह दो कि – “अनन्त जन्म हैं और अनन्त मृत्यु।” ये दोनों एक ही बात हैं। ये भी कह सकते हो, “आत्मा का न जन्म होता है और न मृत्यु,” या ये भी कह सकते हो, “आत्मा मुक्त है अनन्त जन्म लेने के लिए और अनन्त बार मरने के लिए।”

रही शरीर की बात, तुम तो जो अपने आपको माने बैठे हो, तुम्हारा तो एक ही जन्म है। तुम्हें इसी जन्म में जो करना है कर लो, दूसरा जन्म नहीं मिलने वाला।

“अवसर बारबार नहीं आवै।”

एक बार मैंने किसी से पूछा था, “किसी को कभी ये क्यों नहीं याद आता कि पिछले जन्म में वो गधा था?”

पहली बात तो, चौरासी लाख योनियों में ‘मनुष्य जन्म’ एक होता है। ‘मनुष्य जन्म’ में आने की सम्भावना क्या है? एक बटा चौरासी लाख। और जो लोग गणित में ‘प्रोबेबिलिटी’ पढ़ चुके हैं, उनसे पूछता हूँ कि दो बार लगातार ‘मनुष्य जन्म’ पाने की सम्भावना क्या है? ‘एक बटा चौरासी लाख’ गुणा ‘एक बटा चौरासी लाख’। तो कितनी सम्भावना बनी? एक बटा चौरासी लाख गुणा चौरासी लाख।

तो अगर किसी ने जन्म ले भी रखा है, तो पूरी-पूरी सम्भावना है कि वो ‘मनुष्य’ किसी भी हाल में नहीं रहा होगा। तो अगर किसी को अपना पिछला जन्म याद आए भी, तो उसे ये याद आना चाहिए न कि – “मैं अफ्रीका का चिम्पांज़ी था।”

और ये किसने कह दिया कि जीवन, मात्र पृथ्वी ग्रह पर है? पृथ्वी तो ब्रह्माण्ड का एक तिनका, धूल का कण है एक। कितने ग्रहों पर जीवन है। किसी को ये क्यों नहीं याद आता कि – “मैं फलानी आकाश-गंगा में एक एलियन(अन्य ग्रह का प्राणी) तिलचट्टा था”? लोगों को ये ही कैसे याद आता है कि – “बस अभी पैदा हुआ हूँ, पिछले जन्म में मैं पिछले गाँव में था। और वहाँ मेरी बीवी अभी भी ज़िंदा है।”?

पहली बात ये कि अखिल ब्रह्माण्ड में तुमको दो बार लगातार ‘मनुष्य जन्म’ मिला, इतने तो पुण्यात्मा नहीं हो कि दो बार तुम्हें लगातार ‘मनुष्य जन्म’ मिल जाए। पुनर्जन्म जिन्होंने बताया, उन्होंने ये भी तो बताया कि – “अगला जन्म चौरासी लाख योनियों में किसी भी योनि में हो सकता है।”

ये याद है नहीं कि परसों दरवाज़ा लगाकर के चाबी कहाँ छोड़ दी है, परसों चाबी कहाँ छोड़ आए। और परसों जूता उतारा था, तो मोजा जूते में छोड़ा था या धुलने डाल दिया था, ये याद नहीं है। और ये याद है कि सत्तर साल पहले बीवी कौन थी। क्यों किसी बेचारी पर डोरे डालते…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org