क्या ज्ञानी पुरुष भी भोगविलास करते हैं?

विलसन्ति महाभोगैर्विशन्ति गिरिगह्वरान्।

निरस्तकल्पना धीरा अबद्धा मुक्तबुद्धयः॥५३ ||

~ अष्टावक्र गीता

अनुवाद: स्थितप्रज्ञ पुरुष महान भोगों में विलास करते हैं, और पर्वतों की गहन गुफाओं में भी प्रवेश करते हैं, किन्तु वे कल्पना बंधन एवं बुद्धि वृत्तियों से मुक्त होते हैं।

आचार्य प्रशांत: हमारे भोग भी छोटे होते हैं। और हमें विलास से बड़ा डर लगता है। (अनुवाद पढ़ते हुए) कुछ भी उनके लिए वर्जित नहीं है। कभी ऐसा करते भी दिख सकते हैं। कभी वैसा करते भी दिख सकते हैं। कुछ भी कर रहे हो, कुछ भी न कर…

आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org