कोई अमीर कोई गरीब क्यों पैदा होता है? कोई कमज़ोर कोई बलवान क्यों?

प्रश्नकर्ता: प्रकृति मनुष्य के साथ भेदभाव क्यों करती है? किसी को बलवान पैदा करती है, किसी को कमज़ोर; किसी का दिमाग जन्म से तेज़ होता है, किसी का मंद होता है।

आचार्य प्रशांत: प्रकृति को तुम्हारी चेतना से कोई मतलब नहीं है, वो शरीर-भर पैदा कर देती है; और शरीर भी वो भाँति-भाँति के पैदा करती है, जैसे वो प्रयोग कर रही हो। जब तुम देखते हो कि एक पेड़ ऊँचा निकल गया और एक पेड़ टेढ़ा होकर के छोटा-सा रह गया, तो तुम कहते हो क्या कि प्रकृति ने भेदभाव किया? तब तुम कह देते हो, “ये विविधता है, डाइवर्सिटी है।“ एक छोटा फूल है, एक बड़ा फूल है, तब क्या तुम कहते हो “अन्याय हुआ है”? तब क्या बोलते हो? “बायो-डाइवर्सिटी (जैव-विविधता)।“

इन्सान एक छोटू रह गया बिलकुल एकदम, इतना-सा, और एक बड़ा हो जाए, तब तुम कहते हो “नाइंसाफी-नाइंसाफी”? बायो-डाइवर्सिटी है, और क्या है? बायोडाइवर्सिटी है, और कुछ नहीं। अफ्रीकन हाथी जो होता है, उसके कान देखो, और अपना जो देसी है वो छोटू रह गया; कहने को हाथी है, और उसके कान अफ्रीका वाले के आधे नहीं होते। अफ्रीका वाले के दाँत देखे हैं? टस्कर कहलाने का हक़दार सिर्फ़ वही है; और देसी के? तब तो कहते हो, “नहीं-नहीं, दो अलग-अलग चीज़ें हैं, दो अलग स्पीशीज़ (प्रजातियाँ) हैं।“ वैसे ही है भाई!

न्याय वगैरह चेतना के शब्दकोश की बातें हैं। न्याय कहाँ पाया जाता है? चेतना के शब्दकोश में; प्रकृति में न्याय-अन्याय कुछ नहीं होता। हिरण को शेर खा गया, बताओ क्या न्याय है? छोटी मछ्ली को बड़ी मछ्ली खा गई, न्याय कहाँ है? प्रकृति में न्याय नहीं होता; प्रकृति में बस एक व्यवस्था है, एक विधि है, वहाँ न्याय तलाशना मूर्खता है। न्याय की बात इन्सान की चेतना करती है; जितनी ऊँची चेतना होगी, उतनी न्याय की बात करेगी। और न्याय का फिर अर्थ होता है — जो चीज़ जहाँ होनी चाहिए उसको वहाँ रखना, नीची चीज़ को नीचे रखना और ऊँची चीज़ को ऊँचे रखना। जहाँ से ये शब्द आया है न, ‘न्याय’, वहीं से एक शब्द आया है ‘संन्यास’ भी। ‘न्य’ अर्थात् रखना, जो चीज़ छोड़ देने लायक है उसे छोड़ दो, जो चीज़ उठा कर ऊपर रख देने लायक है उसको उठा कर के ऊपर रख दो; संस्कृत की मूल-धातु है, वहाँ से। तो इन्सान की वर्णमाला में, शब्दकोश में न्याय आता है; प्रकृति में न्याय कुछ नहीं है, कोई न्याय नहीं है।

नदी बह रही थी, बड़ा पत्थर था, वो नहीं बहा, छोटा पत्थर बह गया, न्याय क्या है? मैं बैठा हूँ, यहाँ देवा (एक स्वयंसेवक) बैठे हैं, हमने कुछ नहीं किया, हमें कोई आकर के वायरस (विषाणु) लगा गया, न्याय क्या होता है? कुछ नहीं, बात ही बेकार है न्याय की। हमारे दो ही हाथ क्यों हैं, छह हाथ क्यों नहीं हैं? ऐसा ही है बस। बुद्ध से पूछो, वो क्या बोलेंगे? “तथाता, दैट्स द वे इट इज़, ऐसा ही है। इसमें ज़्यादा बहस मत करो, दैट्स द वे इट इज़।“ प्रकृति में यही चलता है, वहाँ न्याय नहीं चलता। शेर कूदा हिरण पर और खा गया, बुद्ध ने क्या…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org