कुमाता कौन और सुमाता कौन?

जद्यपि जनमु कुमातु तें, मैं सठु सदा सदोस।

आपण जानि न त्यागहहिं, मोहि रघुबीर भरोस।।

~ संत तुलसीदास

आचार्य प्रशांत: कोई-कोई ही नहीं होता जिसका जन्म कुमाता से होता है। अगर आप इस श्लोक को सिर्फ प्रकरण के संदर्भ में देखेंगे तो आपको ऐसा लगेगा जैसे कि किसी पात्र-विशेष ने किसी संदर्भ-विशेष में यह बातें बोल दी हैं। नहीं, ऐसा नहीं है। इनकी प्रासंगिकता व्यापक है। जो कहा जा रहा…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org