किस दिशा जाऊँ?

किस दिशा जाऊँ?

प्रश्न: सर, बचपन से एक सपना था, लगता था कि डॉक्टर बनना है| फिर थोड़े बड़े हुए तो सोचा कि डॉक्टर नहीं, इंजीनियर बनना है| कुछ और समझ आयी तो सोचा कि राजनीति में चला जाऊँ क्योंकि मेरा सम्बन्ध राजनीति से भी रहा है, पर फिर किसी ने कहा कि इसमें तो कुछ नहीं है| फिर एक समय आया जब पक्का मन बना लिया कि सेना में जाना है| चयन भी हो गया,पर फिर परिवार से संदेश आया कि मत जाओ, मर जाते हैं| और अब आखिर में इंजीनियरिंग|

इंजीनियरिंग कर रहा हूँ, एक साल हो भी गया, फिर भी अन्दर से मेरा दिल पक्का नहीं है कि मैं एक अच्छा इंजीनियर बन पाऊँगा| अब दोबारा राजनीति की तरफ मन हो जाता है कि इसी तरफ जाना है| कभी भी कोई चीज़ देखता हूँ, उसको अपने हिसाब से उचित ही पाता हूँ, और कोई निर्णय नहीं ले पाता| इस चीज़ को कैसे रोका जाए? मैं इसी दुविधा में हूँ| इंजीनियरिंग करनी है, डिग्री लेनी है, एक बेहतर इंजीनियर बनना है, इस चीज़ को कैसे पाऊँ? इधर भी जाना है मुझे, उधर भी जाना है| मन कुछ कह रहा होता है, कुछ और कर रहा होता हूँ| करना ये है, बातें उस चीज़ की कर रहा हूँ| इस मनोस्थिति को मैं रोकना चाहता हूँ| इस दुविधा से कैसे निजात पाऊँ?

वक्ता: ये हमेशा चलता रहेगा, और इसे किसी भी तरीके से रोका नहीं जा सकता| तुम्हारे ही साथ नहीं, पूरी दुनिया के साथ ये ही चल रहा है| यहाँ पर हो तो वहाँ पर जाना है, और इसी को हम ज़िन्दगी कहते हैं| हमें सिखा दिया गया है कि ज़िन्दगी का मतलब ही है कहीं से कहीं और पहुँचने की चाह, और कहीं से कहीं तक जाने की गति| इसी का नाम ज़िन्दगी है| और हमने इस बात को गहराई से सोख भी लिया है, आत्मसात कर लिया है| और अगर इसमें तुम सवाल ये करोगे कि मेरे लिए उचित क्या है, कहाँ को पहुँच जाना — तो कोई भी उत्तर आखिरी नहीं होगा|

उत्तर मिल जाएंगे| आज तुम जहाँ पर खड़े हो, वहाँ बहुत सारी बातों को ख़्याल में रख कर कहा जा सकता है कि चलो ये कर लो, उसकी कुछ उपयोगिता हो सकती है — लेकिन वो बात आखिरी नहीं हो सकती| जो तुम्हारे साथ हो रहा है कि ये कर लिया, वो कर लिया, चिकित्सा का क्षेत्र, राजनीति, इंजीनियरिंग, सशस्त्र बल, वो चलता ही रहेगा| आज भी तुम्हें कोई उत्तर दिया जा सकता है कि यहाँ पर हो, ये पढ़ रहे हो, आगे के लिए ये दिशा हो सकती है| लेकिन ये सवाल नहीं ख़त्म होने वाला| तुम दो साल बाद यही सवाल लेकर फिर खड़े होओगे, तुम यही सवाल लेकर पाँच साल बाद फिर खड़े होओगे| फिर से तुम्हें कोई उत्तर दे दिया जाएगा| और ऐसा नहीं है कि जो उत्तर दिया जायेगा वो गैरवाजिब होगा|वो उत्तर अपनी जगह ठीक ही होगा, दे दिया जाएगा| तुम बीस साल बाद भी खड़े होगे, और डरावनी बात ये है कि तुम मौत के दिन भी यही सवाल लेकर के खड़े होओगे कि कहाँ जाना है| फिर तुम पाओगे कि कोई उत्तर काम नहीं आ रहा| काम इसलिए नहीं आ रहा है क्योंकि तुमने एक गहरी धारणा बैठा रखी है| तुम…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org