कलियुग कब और कैसे खत्म होगा?

प्रश्नकर्ता: कलियुग खत्म कैसे होगा? और ये जो सब सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलियुग बताए गए हैं; होते क्या है? कृपया थोड़ा प्रकाश डालिए।

आचार्य प्रशांत: बहुत अच्छे। (प्रश्नकर्ता से) मन की अवस्थाएँ हैं, समय ही मन है, मन ही समय है।

"काल काल सब कोई कहै, काल न चीन्है कोय।
जेती मन की कल्पना, काल कहावै सोय।।"

'जेती मन की कल्पना काल कहावै सोय', मन ही काल है।

"नाहं कालस्य, अहमेव कालम"- उपनिषद् कहते हैं।

तो जब समय मन है, काल, युग मन है, तो ये जितने हैं सतयुग, द्वापरयुग, त्रेता सब कहाँ हो गए ये? ये मन में हो गए। ये कोई तुमसे बाहर घटने वाली घटनाएँ नहीं हैं। वेदांत ये तुमको कुछ मूलभूत बातें हैं जो बताता है, बाहर कुछ नहीं घट रहा बेटा! बाहर कुछ नहीं घट रहा। समय का पूरा प्रवाह ही तुममें है। मन साफ़ है—सतयुग है। मन मलिन है—कलियुग है। ऐसा कुछ नहीं है कि ये कैलेंडर पर घटने वाली घटनाएँ हैं, कि फ़लाने इतने हज़ार या इतने करोड़ वर्ष बीत जाएँगे तो फ़िर सतयुग हटेगा फ़लाना युग आएगा फिर फ़लाना युग बीतेगा इतने करोड़ वर्ष बीत जाएँगे।

बड़ी बहस चलती है कि, "अभी कलियुग ख़त्म होने में भाई कितना समय बाकी है जल्दी बताओ?" अरे! छोटू तुम हँस रहे हो—लोगों के लिए बड़े गम्भीर विमर्श का मुद्दा है कि अभी कलियुग ख़त्म में समय कितना बाकी है। ऐसे-ऐसे बैठे हैं वो बता रहे हैं "एंएं… तुम सब तो पीछे रह गए हम तुमको बताते हैं असली बात—अभी कलियुग चल ही नहीं रहा अभी द्वापर चल रहा है!" तो मूढ़ो को पछाड़ने के लिए महामूढ़ो की कमी नहीं है; एक से बढ़कर एक बात बताते हैं।

इसीलिए काल चक्र बोलते हैं। जानते हो जो सारा चक्र है, चक्कर है ये कहाँ चलता है? ये सारा इंसान के खोपड़े में चलता है। कोई बाहर थोड़े ही चल रहा है! हम सोचते हैं कि जैसे जनवरी, फरवरी, मार्च, अप्रैल होता है कि एक बार बीत गया फिर अगले साल फिर आ जाएगा वैसे ही सतयुग, कलियुग होते हैं, कि अभी बीत गए थे पीछे वाले अभी फिर आने ही वाले हैं; नहीं! ऐसा नहीं है।

"मन के बहुतक रंग है, छिन-छिन बदले सोय"

मन में ही सारे परिवर्तन हो रहे हैं, काल का समस्त प्रवाह मन में है। जो मन की सब रंगों से ऊपर की अवस्था है उसको 'सत अवस्था' कहते हैं, और तुम जब वहाँ होते हो तो सतयुग होता है। मज़ेदार बात जानते हो क्या है? जब तुम सतयुग में होते हो तब समय तुमसे बिलकुल बाहर-बाहर घूम रहा होता है, तुम समय के केंद्र में होते हुए भी समय के सिर्फ़ साक्षी होते हो; वो सतयुग है। और तभी कुछ ऐसा होता है जो बहुत अच्छा, बहुत सुंदर, बहुत अनुकरणीय होता है, क्योंकि, तुम हटे हुए होते हो। तुम कहते हो, "ये जो चल रहा है समय का—माने प्रकृति का—माने मन का पूरा खेल वो चलता रहे हम देख रहे हैं।" आनंद-ही-आनंद होता है उस समय; इसीलिए सतयुग को सबसे ऊँचा युग माना गया।…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org