कर्मों का खेल

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कर्मों के बारे में कुछ कहेंगे? कर्म क्या चीज़ है?

आचार्य प्रशांत: हमारे कर्म तो सही चीज़ को पाने का ग़लत प्रयास हैं। जो गहरी नीयत है वो तो ठीक ही है कि शान्ति मिल जाए, पर जो प्रयास की पूरी दिशा है, प्रयास करने वाले का जो केंद्र है, वो गड़बड़ है। प्रयास करने वाले का केंद्र जैसे नीयत से मेल ही ना खाता हो।

हर कर्म के पीछे एक गहन आकांक्षा होती है। हमारी त्रासदी ये है कि हमारा जो कर्ता है वो उस आकांक्षा से दूर हो गया है। जैसे आपका हाथ हो, आपका ही है लेकिन पगला गया है, ऐसा हाथ। अब आप चाह तो रहे हो वो आपको पानी पिलाए पर वो कँप रहा है, जैसा कई बार कई बीमारियों में या बुढ़ापे में काँपता है। आप चाह रहे हो वो आपको पानी पिलाए और वो आपको पानी पिलाने की जगह आपके ऊपर पानी गिरा रहा है। तो ऐसे हमारे कर्म हैं — चाह हम कुछ रहे हैं, हो कुछ और जा रहा है।

जैसे कि जो कर्ता है—करने वाला कौन है? हाथ, उदाहरण के लिए। हाथ करने वाला नहीं होता पर इस उदाहरण में करने वाला कौन है? हाथ। और चाहने वाला कौन है? मन—सिर्फ़ उदाहरण के लिए बता रहा हूँ—तो करने वाले में और चाहने वाले में जैसे एक खाई है बीच में। चाहा कुछ और जा रहा है, हो कुछ और रहा है। जैसे कोई नालायक या विश्वासघाती नौकर हो। उससे कहा कुछ जा रहा है करने को, वो कर कुछ और रहा है। वैसे ही आप चाह रहे हो शांति और आपके कर्मों से क्या आ रही है? अशांति। आप चाह रहे थे कि प्यास मिटे, और आपने क्या किया? कि प्यास और बढ़ गई, और प्यास बढ़ ही नहीं गई है, गीले भी हो गए फ़िज़ूल में। तो ऐसा हमारा जीवन है।

विचित्र घटना घटी है — मालिक और नौकर में दूरी बन गई है। मालिक और नौकर समझते हो न? मालिक कुछ बोल रहा है, नौकर अपनी मर्ज़ी चला रहा है। तो जितने कर्म हो रहे हैं वो सब गड़बड़ कर्म हो रहे हैं। उन कर्मों से फिर वो हो ही नहीं रहा जो होना चाहिए था। हम चाहते हैं शान्ति और पा क्या रहे हैं? अशांति। हम चाहते हैं कि तत्काल शांति मिले और कर्म ऐसे हैं जो शान्ति को समय में आगे ढकेल रहे हैं। हमारे सारे कर्म समय का निर्माण कर रहे हैं। पीछे से आते हैं, आगे को जाते हैं। तत्काल वहाँ कुछ होता ही नहीं।

प्र२: हम जब शान्ति के लिए इधर-उधर प्रयास करते हैं, तो उसमें ये आता है कि मोमेंट(इस क्षण) में रहो, अभी में जीना सीखो, ये करो, वो करो। तो फिर हम लोग जो सोच रहे हैं कि हमें ये करना है या हमें वो सोचना है, तो दोनों चीज़ों में विरोषाभास लगता है।

आचार्य: किसी गुरु ने नहीं सिखाया है कि मोमेंट में रहो, गुरुओं ने सिखाया है परमात्मा में रहो। 'मोमेंट में रहो' ये आपको पाश्चात्य उपभोक्तवाद ने सिखाया है। और उसका अर्थ ये होता है कि, "अभी सामने पिज़्ज़ा आया है तो खा ले न, आगे की क्या सोचता है, पगले! जल्दी खा और फिर पैसा निकाल। जल्दी से खा और फिर जल्दी से जेब ढीली कर भाई।"

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org