कई बुद्ध पुरुषों ने समाज क्यों छोड़ा?

प्रश्न: जो बुद्धजन सत्य को प्राप्त हुए, वो समाज से क्यों दूर चले गए?

आचार्य प्रशांत: समाज से दूर हम सब हैं। बुद्ध तो मुझे लगता है समाज के बहुत पास थे, उन्होंने तो हज़ारों लोगों को गले लगा लिया था। आप कितनों को कहोगे कि — “ये मेरे मित्र हैं, मेरे घनिष्ठ हैं, मेरा परिवार हैं?” कितनों को कहोगे? पाँच, दस, चालीस, पचास? बुद्ध के लिए तो पचास हज़ार थे। अब आप बताओ, आप असामाजिक हो या बुद्ध असामाजिक थे?

असामाजिक आप हो क्योंकि आपका समाज इतना-सा है। चार लोगों से ज़्यादा बड़ा आपका परिवार नहीं हो पाता। बुद्ध का परिवार? चालिस हज़ार लोगों का!

ओशो ने कम्यून स्थापित कर दिया था, उन्होंने तो पूरा समाज बना ही डाला था, और आप कह रहे हो कि वो समाज से दूर चले गए,असामाजिक हो गए। देख नहीं रहे हो कि ये सब कहानियाँ हम गढ़ते ही इसलिए हैं ताकि बुद्धत्व से किसी तरीके से भाग सकें, “असामाजिक हो जाएँगे, ये हो जाएगा, वो हो जाएगा।” वो असामाजिक हो गए होते, तो उनके किस्से आप तक कैसे पहुँचते?

कौन है जो समाज से भागा था? कृष्ण समाज से भागे थे? जीसस समाज से बाहर भागे? कबीर समाज से बाहर भाग गए थे? नानक भागे थे? कृष्णमुर्ति भागे थे? कौन भागा था समाज से बताओ?

एक इनमें से बता दो जो कि समाज से बाहर भाग गया था। हाँ, इतना ज़रूर हुआ था कि उन्होंने समाज को परिष्कार कर दिया था। चूँकि वो स्वयं साफ़ हो गए थे, तो उनके इर्द-गिर्द का समाज भी साफ़ होने लग गया था। इसी से हम डरते हैं क्योंकि हमने अपनी पहचान ही किससे बैठा ली है? मैल से, गंदगी से।

जब मैल से पहचान बैठा लो, तो सफ़ाई बड़ी भयानक लगती है।

ये जानते थे लोगों से गले मिलना, क्योंकि इनके लिए विभाजन नहीं थे। ये नहीं कहते थे कि — “तू अगर इस जात का है तो मैं तुझसे नहीं मिलूँगा।” आप मिल पाते हो हर जात के, हर धर्म के लोगों से समभाव से? बुद्ध मिल लेते थे। आप तो बगल के घर में जो रहता हो उससे समभाव से न मिल पाओ! आप तो कहोगे, “ये मेरा घर है, ये मेरे बच्चे हैं।”

“ये मेरे बच्चे” — पड़ोस के बच्चे किसी और के हो गए? अब बताओ असामाजिक कौन हुआ? आप कहते हो, “ये मेरा घर है, इसमें जितने लोग रह रहे हैं, ये मेरे अपने हैं। ये स्त्री मेरी है, ये कुत्ता मेरा है।”

वास्तव में एक बुद्ध ही सामाजिक हो सकता है, हम नहीं हैं सामाजिक।

हमारा तो जैसा समाज है ,वहाँ क्या होता है?

वहाँ लड़ाईयाँ होती हैं।

ये समाज भी अगर किसी तरीके से घिसपिट के, चरमरा के चल रहा है, तो इसलिए चल रहा है क्योंकि इसे बुद्धों का थोड़ा बहुत स्पर्श मिला। उसी कारण से किसी प्रकार घिसट-घिसट के चल रहा है।

(सामने लगे बुद्धपुरुषों और संतों के चित्रों की ओर इंगित करते हुए) यहाँ सब ऐसे हैं जो गाँव-गाँव घूमे थे। इन्होंने बड़ी यात्राएँ की थी। अपने आपको एक शहर, एक प्रान्त, एक जगह तक सीमित नहीं रखा। नानक हैं, पूरा भारत घूम लिया, बिहार घूम आए और उधर जाकर अरब में मक्का-मदीना हो आए। उनके लिए तो पूरा संसार ही समाज था।

पूरा वीडियो यहाँ देखें।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org