एक भय परम तक भी ले जाता है

यदिदं किं च जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम्।

महद् भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति।।

(कठोपनिषद, अध्याय 2, वल्ली 3, श्लोक 2)

ये जो कुछ सारा जगत है प्राण — ब्रह्म में, उदित होकर उसी से, चेष्टा कर रहा है। वो ब्रह्म महान भय रूप और उठे हुए वज्र के समान है। जो इसे जानते हैं वो अमर हो जाते हैं।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org