एक गुरु से पाना चाहे और कुछ नहीं पाता है, दूजा गुरु के प्रेम में पाना भूल जाता है

बिना प्रेम के कुछ सीख नहीं पाओगे। जिनसे सीख रहे हो, उनसे लेन-देन का, दुकानदार और ग्राहक का रिश्ता नहीं हो सकता। (मूर्तियों की ओर इशारा करते हैं) ये जितनी मूर्तियाँ यहाँ उपस्थित हैं, इनको अगर देखते ही तुम्हारा मन बिल्कुल हर्षा नहीं जाता, तो उनसे कुछ पाने की सम्भावना मत सोचना।

प्रेम पहले आता है, फिर बोध।

--

--

आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org