एकाग्रता और ध्यान में अंतर

संसार में जो भी वस्तुएँ हैं सब सीमित हैं, छोटी हैं। छोटे को जब लक्ष्य बनाओगे तो वो कहलाती है ‘एकाग्रता’ और अनन्त को जब लक्ष्य बना लेते हो तो वो कहलाता है ‘ध्यान’।

एकाग्रता बहुत काम नहीं आती क्योंकि छोटी चीज़ को ध्येय बनाया, तो जो मिलेगा वो छोटा ही होगा और छोटा पाकर के जी किसका भरता है?

छोटा-छोटा तो मिलता ही रहता है, हम बेचैन रहे आते हैं इसलिए फिर ध्यान आवश्यक है।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org