ऊब कहीं बाहर से नहीं, तुम स्वयं से ही ऊबे हुए हो

प्रश्नकर्ता: सर, आपने बताया कि जो भी करने से तुम्हारा मन हल्का होता है वो करो। लेकिन अगर इस प्रक्रिया में ही मेरा मन भारी हो तो?

आचार्य प्रशांत: न भारी हो रहा है या मन का भारीपन सामने आ रहा है? इन दोनों बातों में फर्क करना पड़ेगा। मन भारी तो सदा से था पर ऐसे बेहोश थे कि अपनी ही बिमारी का पता नहीं था। बीमारी अचेतन में घुस करके बैठी हुई थी। ओर होश की प्रक्रिया है अचेतन को चेतन कर…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org