उसकी आँखों में तुम्हारी ही तस्वीर है

प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। जो हम पौराणिक विचारधाराएँ सुनते हैं और हम बड़े लूज़ली (शिथिल) ‘सनातन परंपराओं’ जैसे शब्द बोलते हैं उसमें एक ख़ास प्रकार की महत्वता हम किंचित पशुओं को देते हैं। चूँकि मैं पशुओं के ही कल्याण के क्षेत्र में काम करती हूँ, तो हिंदू होने के नाते हमें बताया जाता है कि फर्स्ट अमोंग इक्वल्स (बराबरी में पहले) गाय होती है।

गाय में पौराणिक देवी-देवताओं की छवि होती है — वगैरह-वगैरह — और कुछ पशु निम्न होते हैं। इसके बारे में हमें वेदान्त से क्या पता लगता है या इसका हम क्या अर्थ निकाल सकते हैं? क्या यह बिलकुल ही ऐसी सोच है जिसको नकारात्मक कर देना चाहिए या इसमें कोई सच्चाई है?

आचार्य प्रशांत: वेदान्त इस बारे में बहुत स्पष्ट है और बहुत सीधी बात करता है। सनातन धर्म की परिभाषा से ही शुरु करते हैं। चेतना का कल्याण ही धर्म है — यही परिभाषा दी थी न। जब हम कह रहे हैं, ‘मन को आत्मा की ओर ले जाना ही सनातन धर्म है।’ तो उसी को दूसरे शब्दों में कहेंगे, ‘चेतना का — दोहराइये — चेतना का कल्याण ही धर्म है।’ इसके अतिरिक्त और नहीं कुछ धर्म होता!

क्या इस परिभाषा में कहीं कहा गया है, मनुष्य की चेतना का कल्याण धर्म है? चेतना मात्र का — कोंशियसनेस वेयरएवर इट इज़ (चेतना कहीं भी हो) — उसका कल्याण ही धर्म है। अगली बात, क्या चेतना अपने मूल स्वरूप में अलग-अलग प्रकार की, अलग-अलग रंग की होती है या चेतना एक ही होती है? जिन्होंने जाना है उन्होंने कहा है, ‘पीर सबन की एक है, मुर्गी, हिरनी, गाय।’ दर्द तो सबको एक-सा होता है न और चेतना की मूल पहचान ही…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org