उचित कर्म पता कैसे हो?

मन्दिर के सामने से जब हिन्दु निकलता है, तो सामान्यतया उसके लिये क्या ठीक है? तुम जा रहे हो पैदल और सड़क किनारे मन्दिर आ गया तो तुम्हारे लिये क्या ठीक होता है? सामान्यतया कि दो क्षण रुक कर प्रणाम कर लो और उसी मन्दिर के सामने से किसी और धर्म का कोई निकल जाए तो उसके लिए ये ठीक नहीं होता।समझ में आ रही है बात? व्यक्ति को निर्णय करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी कि क्या ठीक है और क्या गलत।तुम्हें एक पहचान दे दी गई है कि तुम एक धर्म विशेष से हो और निर्णय हो गया।तुमने कहाँ किया निर्णय?

दो देशों का युद्ध हो रहा होता है और तुम्हें तय करना है कि किसका समर्थन करें, तो तुम्हें तय करना ही नहीं पड़ता।जिस देश के तुम हो, तुम उसी का समर्थन करोगे, तय हो गया।तय करना कहाँ पड़ा? किसी और ने पहले ही तय कर रखा था और दुनिया ऐसे ही चल रही है ना? ‘’जो परंपरा आज विद्यमान है, वही कर डालो, वही उचित है!’’ और अगर वही उचित है तो तुम्हें तय करना कहाँ पड़ा? जो चल रहा है, जो प्रचलित है, तुमने भी कर डाला।क्या तय करना पड़ा तुम्हें? हाँ, पर अगर तुमसे कोई पूछेगा कि ‘’ये कर क्यों रहे हो?’’ तो तुम कहोगे कि ‘’यही सही है।‘’ पर सही का निर्धारण तुमने किया कहाँ? तुम्हें तो मिल गया था रेडीमेड बना-बनाया।दुनिया ने तुम्हें बताया ऐसे करना है और तुमने कर डाला।

शादी-ब्याह एक प्रकार से होती है।आज से 50 साल पहले वैसे नहीं होते थे और आज से 200 साल पहले वैसे नहीं होते थे।आज से 50 साल पहले लोग उन रस्मों को सही मान लेते थे जो तब प्रचलित थीं और आज कुछ रस्में पीछे छूट गई हैं और कुछ नयी रिवायतें आ गई हैं।तो जो अब नये रिवाज़ आ गए हैं, वही उचित है! तुम्हें निर्णय कहा करना पड़ा? तुम्हारे लिए सारे निर्णय तो पहले से किए जा चुके थे; कहानी पहले ही लिखि जा चुकी है।ये दुनिया ऐसे ही तो चल रही है।

साल में चार दिन होली, दशहरा, ईद, दिवाली, क्रिसमस और तुम कहते हो हम खुश हो गए।तुम्हें खुश होने का भी निर्णय कहाँ करना पड़ा? किसी ने पहले ही कह दिया कि ‘’एक दिन आएगा 26 अक्टूबर और तुम खुश हो जाना’’ और तुम खुश हो जाते हो।तुम्हें खुश होने का फैसला भी कहाँ करना पड़ता है? उसका भी कोई पहले से ही निर्णय किए बैठा होता है कि साल में 5–7 दिन तुम्हें खुश रहना होता है। बटन दबा, अब खुश हो! साल में दो दिन आते हैं और तुम राष्ट्र भक्त हो जाते हो और तुम कहते हो ‘’यही तो उचित है कि आज हम राष्ट्रीय भक्ति के गीत गाएँ,’’ वो भी तुमने कहाँ निर्णय लिया? किसी और ने पहले ही कर रखा है, पूरी प्रोग्रामिंग पहले ही कर रखी है, और तुम कहते हो ‘’निर्णय हमारा है।‘’ सही-ग़लत के निर्णय लोगों को करने ही नहीं पड़ते। पहले ही बताया जा चुका है ‘’झूठ मत बोलो, बड़ों का आदर करो, चोरी मत करो, पराई स्त्री की तरफ आँख उठाकर मत देखो,यही सब तो ठीक है।‘’ अब ये मत समझना कि मैं…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org