ईमानदारी के अलावा कोई विधि नहीं

आचार्य प्रशांत: अच्छा, आपने एक चीज़ गौर करी है? यूँ ही, कहीं रहो, घर में, बाज़ार में, बोलना आसान होता है। यहाँ आते हैं, शुरुआत में, बोलना थोड़ा सा अटक जाता है और फिर कुछ देर बाद, या आधे घंटे बाद, यहाँ भी बोलना आसान हो जाता है, बहाव आ जाता है। बाज़ार में भी शब्द बोल रहे होते हैं, कुछ देर बाद यहाँ पर भी शब्द झरने लगेंगे। दो बहाव दिख रहे हैं हमको, और बीच में एक ये अंतराल आता है, अड़चन का। ये क्या है?

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org