इनकी हैसियत नहीं संस्कृत का सम्मान करने की

संस्कृत का महत्व यह है कि जो संस्कृत को जानेगा, वो भारत के दर्शन को, इतिहास को, विज्ञान को, संस्कृति को, और तमाम भारतीय भाषाओं को बेहतर जान पायेगा, इनसे है संस्कृत का संबंध। संस्कृत की उपयोगिता क्या है? हम संस्कृत को इसलिए भी बढ़ा चढ़ा कर, गौरवान्वित करके प्रस्तुत कर सकते हैं कि साहब ये देव भाषा है, और हमारे सब धार्मिक आध्यात्मिक ग्रंथ संस्कृत में लिखे गए थे, वो तो चलो फिर एक बात हो गयी, आस्था की बात हो गयी। लेकिन व्यावहारिक महत्व क्या है आज संस्कृत का? आज कोई व्यक्ति है जो मान लो बहुत आस्थावान नहीं है, जिसकी धर्म में, अध्यात्म में बहुत आस्था नहीं है, वो संस्कृत क्यों सीखे? वो तभी सीखेगा, जब उसमें इतनी चेतना होगी कि वो जानना चाहे भारतीय दर्शन के बारे में, इतिहास के बारे में, संस्कृति के बारे में, और तमाम भारतीय भाषाओं के बारे में क्योंकि संस्कृत तमाम इंडो-यूरोपियन भाषाओं की माँ जैसी है। सिर्फ तब तुम संस्कृत को सम्मान दे पाओगे।

अब जो लोग संस्कृत का उपहास करते हैं, ज़रा उनकी हालत देखो। संस्कृत तुम्हें आती होती तो तुम आध्यात्मिक ग्रंथों को बेहतर पढ़ पाते, या अगर अध्यात्म में तुम्हारी आस्था हो तो तुम पाओगे कि जिन आध्यात्मिक ग्रंथों से तुम्हें बहुत फायदा हो रहा है वो सब लिखे हुए है संस्कृत में, तो अपने आप ही तुम्हारा संस्कृत के प्रति सम्मान बढ़ जाएगा। तुम ज़रा चैतन्य आदमी हो, ईमानदारी से जीते हो, अध्यात्म की ओर तुम्हारा झुकाव है, जानवर सरीखे ही नहीं हो, मनुष्य हो, ऐसा मनुष्य जो जीवन को समझना चाहता है, जानना चाहता है, सही कर्म क्या, गलत कर्म क्या, कैसे जियें, कैसे निर्णय करे, तो तुमने उपनिषद पढ़े, तुमने भगवद गीता पढ़ी, और जब तुमने इनको पढ़ा तो तुमने पाया कि वहाँ जो मूल श्लोक है उसकी भाषा संस्कृत है। तो अपने आप तुम्हारे मन में संस्कृत के प्रति सम्मान उठेगा। तुम कहोगे इससे मैंने इतना कुछ सीखा, और यह मूलतः संस्कृत में है; तो संस्कृत तो आदरणीय हो गयी मेरे लिए। लेकिन अगर कभी तुम्हारे भीतर जागृति की कोई इच्छा ही नहीं रही, तुम चैतन्य आदमी ही नहीं हो, गीता से और उपनिषद से, अध्यात्म से, तुम्हारा दूर-दूर तक कोई लेना देना ही नहीं, तो तुम्हे संस्कृत की उपयोगिता कुछ क्यों पता चलेगी? संस्कृत में जो कुछ है, वो आज तक तुम्हारे काम ही नहीं आया तो तुम्हारे मन में संस्कृत के प्रति भी अपमान रहेगा, उपहास रहेगा। ऐसे ही हैं ज़्यादातर लोग, ऐसे ही हैं वो लोग जिनके बारे में तुम कह रहे हो कि वो संस्कृत का मज़ाक बनाते हैं, उनका क्या लेना देना अध्यात्म से? इसी तरीके से, ये ऐसे लोग हैं जो किसी भी तरह की सांस्कृतिक चेतना से बिल्कुल कटे हुए हैं; इनका संस्कृत से क्या ताल्लुक? इनको तो एक ही संस्कृति पता है, वो जो आज की सड़क की प्रचलित संस्कृति है। ये कहां जानना चाहते हैं कि हम कहां से आये हैं? हमारी…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org