इतना क्यों लिपटते हो दुनिया से?

अहम् ने प्रकृति के साथ जुड़े रहने का बड़ा लंबा अभ्यास कर रखा है। एक तरह का रिफ्लेक्स एक्शन हो गया है। रिफ्लेक्स एक्शन जानते हैं न? जिसके लिए आपको विचार भी नहीं करना पड़ता, अपनेआप हो जाता है। जैसे नाक पर मक्खी बैठी और आपने हाथ से हटा दिया। इस तरीके से हम वृत्तियों के गुलाम हो गए हैं क्योंकि हम उनसे बहुत समय से जुड़े रहे हैं। अब हटने का भी ‘अभ्यास’ करना पड़ता है। समय लगता है; तत्काल नहीं होगा।

लेकिन, हाँ, समय कम लग सकता है अगर आपका इरादा पक्का हो। लेकिन यह मत चाहिएगा कि आप सुनेंगे और काम हो जाएगा। सच तो यह है कि सुनकर भी काम हो सकता है लेकिन फिर उसके लिए अनंत इरादा चाहिए। कृष्णमूर्ति कभी-कभार कहा करते थे कि — “अगर तुम ठीक-ठीक सुन रहे हो, अगर गहराई से सुन रहे हो, तो जब तुम इस हॉल से बाहर निकलोगे, तुम मुक्त होगे”। इतनी लंबी बात कह दी उन्होंने। बोलते थे कि अगर आपके सुनने में दम है तो आपको एक दिन भी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी, जब आप यहाँ से बाहर निकलेंगे, आप बिलकुल आज़ाद होंगे।

लेकिन वैसा श्रोता होना मुश्किल है न? वैसा श्रोता मिलना मुश्किल है। वैसा वक्ता मिलना भी मुश्किल है कि उसकी बात में ही इतना दम हो कि कोई सुनके ही आज़ाद हो जाए। लेकिन अभ्यास से काम होता है।

श्रीकृष्ण अर्जुन को जो दो मंत्र देते हैं, श्रीमद्भगवद्गीता में, वह दोनों आपके लिए उपयोगी हैं। वो कहते हैं — ‘अभ्यास’ और ‘वैराग्य’ — अर्जुन, इससे होगा! ‘अभ्यास और वैराग्य’। समय लगेगा। अभ्यास का मतलब ही है समय, धीरे-धीरे होगा।

लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में अगर आपको थोड़ी भी सफलता मिल रही हो, तो उसको बहुत मानें, और उस सफलता से अपनेआप को प्रेरित रखें। आप कहें कि अगर थोड़ी सफलता मिली है, थोड़ा आगे बढ़े हैं, तो माने और आगे भी बढ़ सकते हैं। क्योंकि चुनौती बड़ी है। लाखों वर्षों का हमारा अभ्यास है प्रकृतिगत रहकर ही जीने का। यह तो एक नई चीज़ हो रही है न कि प्रकृति से जुड़े-जुड़े यह जो मुझे एक छटपटाहट हो रही है, उसके कारण अब मैं दूर होना चाहता हूँ प्रकृति से। प्रकृति का भोक्ता नहीं, साक्षी होना चाहता हूँ। यह नई चीज़ है। पुराना अभ्यास बहुत लंबा है, उसको मिटाने में थोड़ा समय तो लगेगा।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org