आराम करने में मज़ा आता है?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, पिछले सत्र में आपने कहा था कि साहस की कमी है, तो मैंने ये रियलाइज़ करा कि मैं चीज़ों को छोड़ कर भाग जाता हूँ, उसका सामना नहीं करता हूँ। तो उसपर काम कर रहा हूँ। आपने दूसरी चीज़ भी बताई थी, संकल्प को लेकर के। संकल्प के लिए मैं कोशिश कर रहा हूँ लेकिन तमसा बहुत ज़्यादा हावी हो जा रही है, उससे मैं बाहर नहीं निकल पा रहा हूँ। उससे बाहर कैसे निकलूँ?

आचार्य प्रशांत: क्यों निकलें बाहर? तमस समझते हैं न क्या होता है? बहुत तरीकों से उसका वर्णन किया गया है पर इस प्रश्न के सन्दर्भ में मैं एक और तरीके से कहे देता हूँ। जैसे माँ की कोख, वहाँ प्रकाश तो नहीं होता, पर परेशानी भी नहीं होती। गर्भ में कौन-कौन परेशान था हममें से? और गर्भ में कौन-कौन चैतन्य था हममें से? कोई था जिसको ज़रा होश था, कुछ खबर थी दुनिया में, क्या हो रहा है क्या नहीं हो रहा है? दुनिया छोड़ दो माँ को भी क्या हो रहा है, ये गर्भ के शिशु को पता होता है?

ये तमस है, उदाहरण के लिए कह रहा हूँ, तमस है ये। क्यों बाहर आएँ, ज़रुरत क्या है? जब आराम है वहाँ पर, कोई फ़िक्र नहीं, तो तमसा छूटे क्यों? यही वजह है कि ज़्यादातर लोगों की तमसा नहीं छूटती। आराम है न, कोई आके झिंझोड़ नहीं रहा, कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। अपने लिए खुद दायित्व उठाते हुए कुछ प्रबंध नहीं करना।

पैदा हो गए अगर होश में, रौशनी में, तो माँ कितनी भी करीब हो आहार के लिए फिर भी चिल्लाना तो पड़ेगा, नहीं तो माँ भी नहीं उठाएगी। तमसा ऐसी ही है। हममें से ज्यादातर लोग इसीलिए कहा जाता है कि कभी पैदा ही नहीं होते। क्योंकि पैदा होने का मतलब ही है कि जान जाओ कि कुछ काम करना है।

जो बच्चा पैदा होता है उसे कोई बड़ा काम भले ही नहीं समझ में आता करने के लिए पर इतना काम तो वो भी समझ जाता है कि आहार चाहिए। गर्भ में एकदम कुछ काम नहीं करना पड़ता था, पैदा होते ही एक काम तो उसके लिए अनिवार्य हो जाता है, क्या? रोना। रोएगा नहीं तो माँ छाती से नहीं लगाएगी, रोएगा नहीं तो पुतड़े नहीं बदले जाएँगे। हो सकता है मच्छर काट रहा हो बैठ करके, रोएगा नहीं तो कोई आकर के मच्छर-मक्खी हटाएगा नहीं।

तो पैदा होने का मतलब ही होता है ज़िम्मेदारी में पैदा होना। हम ज़िम्मेदारियाँ उठाना नहीं चाहते। अब क्यों नहीं उठाना चाहते मत पूछो मैं क्या बताऊँ, ऐसे ही हैं हम। बात ये नहीं है कि क्यों नहीं उठाना चाहते, बात ये है कि नहीं उठाना चाहते तो उसके दुष्परिणाम क्या हैं? वो भोगते रहने को तैयार हैं तो मत उठाइए।

सुबह बिस्तर से उठना किसको अच्छा लगता है? कौन यहाँ ऐसा है जिसको भीतर से ये भाव नहीं उठता सुबह-सुबह कि, “बस पंद्रह मिनट और!” तो आप अगर इस प्रश्न में जीएँगे कि ये वृत्ति हममें होती ही क्यों है, तो…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org