आधी रोटी खाएँगे, जंग जीत के लाएँगे

आचार्य प्रशांत: मैं छोटा था तो मुझे पढ़ने के साथ-साथ प्रतिस्पर्धात्मक होने का बड़ा शौक था। मेरे लिए ज़रूरी हो गया था, फर्स्ट (प्रथम) आना। तो एग्जाम (परीक्षा) हुआ करें फिर टीचर्स (अध्यापक) आएँ, तो वो आंसर-शीट (उत्तर-पुस्तिका) के बंडल लेकर के आती थी। तो वो ऐसे रख दें और फिर वो कॉपियाँ बँटती थीं। और उस वक्त सबकी धड़कने थम जाती थी, कि भई अब मार्क्स (अंक) पता चलेंगे।

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रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

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