आदमी का होना ही हिंसा है

हम सिर्फ़ माँस के लिए थोड़ी ही जानवरों को मार रहे हैं। जितने तरीके हो सकते हैं उन सभी से मार रहे हैं। कोई तरीका हमने नहींं छोड़ा है जानवरों को सताने का। उनकी हत्या करने का। उनका खून पीने का।

और सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उनमें हमारे जितना कपट नहींं है। नहीं तो हमारे पास और कौनसी योग्यता थी कि हम पशुओं पर राज कर लेते? कपट ज़्यादा है हमारे पास। उस कपट को ही बुद्धि का नाम दे देते हैं। बंदूक हमारे पास है, इसलिए हम राज कर रहे हैं।…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org