आत्मा का क्या रूप है?

आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) मूलतः बात ये पूछी है कि “आत्मा को कहा तो निर्गुण जाता है, और निर्गुण का अर्थ हुआ कि कोई एट्रिब्यूट (गुण) नहीं, कोई उपमा-उपाधि नहीं। तो फिर आत्मा को निर्गुण के साथ ही निर्विकार, निर्मल, निराकार, अविनाशी, नित्य, शुद्ध, अजर-अमर इत्यादि क्यों कहा जाता है? क्योंकि ये सब तो कह कर के हम आत्मा के साथ गुण और उपाधियाँ और विशेषण जोड़ रहे हैं न?” ये शंका उठी है।

ये बताओ पहले कि ये सारी बातें कही किससे गईं हैं, आत्मा से कही गईं हैं क्या? क्या आत्मा को बताया जा रहा है कि “तुम निर्गुण, निराकार, अविनाशी, अजर-अमर हो”? ये सारे ग्रंथ किसके पाठ हेतु रचे गए? परमात्मा के? बुद्ध पुरुषों के? उन्हें आवश्यकता थी? किसको कहा जा रहा है कि “आत्मा को सदा निर्गुण ही जानना” ये बात किसको कही जा रही है?

प्रश्नकर्ता: जीव को।

आचार्य: अरे हमको कही जा रही है! हर बात को उलझाना है, सीधा जवाब ही नहीं न।

ये बात किससे कही जा रही है? हमसे कही जा रही है, और हम कैसे लोग हैं?

प्र: अज्ञानी।

आचार्य: हम वो लोग हैं जो हर चीज़ में गुण देखते हैं। हम प्रकृति-बद्ध लोग हैं, और जहाँ प्रकृति है वहाँ गुण है। चूँकि हमें हर जगह गुण देखने की आदत है, तो हमसे कहा गया कि “बेटा! परमात्मा निर्गुण है। अपनी आदतों को परम-सत्ता पर मत चला देना।“

ठीक उसी तरीके से, हम वो लोग हैं जो जन्म लेते हैं और फिर बुढ़ाते हैं। तो हमने तो जिस भी चीज़ को देखा है, उसका एक नियत काल-खंड देखा है, उसे आते और जाते देखा है, जीवों को वृद्ध होते और फिर मरते देखा है। हमारे हिसाब से तो जो कुछ होता है वो कभी-न-कभी जाता ज़रूर है। तो हमसे कहा गया कि “थमो बेटा! परमात्मा को अजर-अमर जानना। न उसकी वृद्धि है, न उसका क्षय है, और फिर न उसकी मृत्यु है।” जिस चीज़ का क्षय नहीं है, उसको कहेंगे ‘अक्षय’। जो चीज़ वृद्धावस्था को प्राप्त हो जाए, उसको कहेंगे कि वो ‘जर’ हो गई। जिसको बुढ़ापा न आता हो, उसे कहेंगे ‘अजर’। और हमने तो जिसको देखा, बूढ़ा ही होते देखा। तो हमारी आदत बन गई है ये मानने की कि जो होता है वो काल का ग़ुलाम ही होता है; काल के साथ पैदा होता है, फिर वृद्धि लेता है, फिर उसका क्षय होता है, और अंततः उसकी विलुप्ति हो जाती है। ऐसा हमने देखा। हम अपने अनुभवों को परमात्मा पर न लाद दें, इसलिए हमसे कहा गया कि परमात्मा को अजर जानो। ये परमात्मा का कोई गुण नहीं बताया जा रहा है, कि “परमात्मा अजर है,” ये हमें काटा जा रहा है, हमारी आदत को काटा जा रहा है। समझो बात को।

इसी तरीके से, हमने जिस भी चीज़ को देखा, सदा उसे दोषयुक्त, विकारपूर्ण ही पाया न! कोई है यहाँ पर जिसने दुनिया में कुछ भी ऐसा देखा हो जो…

आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org