आत्मा कहाँ है?

भ्रम वाली बात ये है कि आप आत्मा नहीं बोलते हो, आप ‘मेरी आत्मा’ बोलते हो, और ‘मेरी’ से आपका मतलब होता है: मेरा शरीर; आपने आत्मा को भी शरीर के अन्दर बैठा दिया है।

‘आपकी’ समझ थोड़ी ही है, जैसे चेतना आपकी नहीं होती, वैसे ही समझ भी आपकी नहीं होती है।

जब तक समझ ‘आपकी’ है, तब तक वो सिर्फ़ आपकी मान्यता है, मत है, वो ‘समझ’ नहीं है। समझ अव्यक्तिक होती है, ‘आपकी’ नहीं होती है। धर्म के इतिहास में सबसे बड़ी भूल यही हुई है कि आदमी ने आत्मा को शरीर के भीतर अवस्थित कर दिया है।

देखिये, आत्मा की जो पूरी बात है वो कही ही इसलिए गई थी कि आपको समझ में आए कि ये सब कुछ जो सब दिखाई देता है, जो पदार्थ है, भौतिक है, ये इन्द्रियों से भीतर आता है, इन्द्रियों द्वारा ही निर्मित है, ये पूरा खेल सिर्फ मानसिक है, शरीर भी पदार्थ है।

तो आत्मा शब्द ही इसीलिए रचा गया था कि आपको समझ में आए कि शरीर के परे, जगत के परे, पदार्थ के परे, एक परम सत्य है, इसलिए दिया गया आत्मा।

और होशियारी क्या करी आदमी ने?

कि आत्मा को अपने भीतर बैठा लिया।

आत्मा क्या है?

“वो मेरे कहीं इधर-उधर पाई जाती है, शरीर के भीतर होती है। शरीर के भीतर नहीं होती, तो कम से कम मन के भीतर तो होती ही है!”

जिसको देखो वही चिल्ला रहा है –‘मेरी आत्मा! मेरी आत्मा!’

मेरी आत्मा का क्या मतलब होता है?

जैसे दिमाग है आपका, जैसे शरीर है आपका, वैसे ही आत्मा भी आपकी ही है; और ये बड़ी ज़बरदस्त भूल हुई है।

और कुछ हद तक इसके ज़िम्मेदार जिन्होंने धर्म ग्रन्थ रचे वो भी हैं।

मैं गीता देख रहा था, उसमें ‘मया’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है, अब ‘मया’ का अर्थ ही यही होता है — मुझमें, मेरे भीतर। तो जैसे ही यह बोल दिया गया कि मेरे भीतर आत्मा स्थित है, तो आदमी को तो यही लगेगा न कि ‘मेरे भीतर’ यानी शरीर के भीतर।

तो जो शब्दों का चयन भी है, वो पूरी सावधानी से नहीं किया गया, यही कारण है कि आम लोगों में, जन मानस में यह भ्रम है कि आत्मा कोई ‘हमारी’ चीज़ है।

आत्मा ‘आपकी’ थोड़ी ही कोई चीज़ है, ‘आपकी’ कोई आत्मा-वात्मा नहीं होती।

आपकी नहीं है कोई आत्मा, आपआत्मा में स्थित हो और वो आपकी नहीं है। ये ऐसी-सी ही बात है कि नदी की, या सागर की मछली बोले कि, ‘मेरा सागर’।

अरे! तुम उसके भीतर हो, वो तुम्हारे भीतर थोड़ी ही है!

तो आदमी ने दो काम करें हैं: पहला तो, आत्मा को वस्तु बना दिया है, जो पदार्थ है नहीं…

--

--

आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org