आचार्य जी से जो चाहा था वो मिला नहीं

मेरे पास लोग आते हैं और कई बार धोखे से, इमानदारी के किसी क्षण में कह ही जाते हैं कि, “आचार्य जी आपके पास आये, बड़ी सांगत की, बड़ी बातें सुनी, बड़ा पालन भी किया, लेकिन वो सब नहीं मिला जो हमें चाहिए था।” बड़ा दर्द रहता है लोगों के दिलों में।

मैं पूछता हूँ कि इस बात के लिए शुक्रगुज़ार नहीं हो तुम मेरे, कि तुम्हें वो सब नहीं मिला जो तुम्हें चाहिए था! मेरा काम तुम्हें वो देना नहीं है जो तुम चाहते हो। तुम बस ये बता दो जैसे तुम थे, मेरे पास आने से पहले, और जैसे तुम हो, मेरे पास आने के बाद, क्या तुम दोबारा वैसा होना चाहोगे, जैसा यहाँ आने से पूर्व थे। कहते हैं, “नहीं! नहीं! वैसा तो हम किसी हाल में अब नहीं होना चाहेंगें जैसे हम पहले थे। वो आदमी ही बड़ा मूर्ख था।”

शान्ति की जो तुम्हारी परिभाषा है वो एक अशांत मन से आ रही है, तो तुम्हारी शान्ति की परिभाषा ही गलत है। हल्केपन की तुम्हारी जो परिभाषा है, वो बड़े भारी केंद्र से आ रही है, तुम्हारी हल्केपन की परिभाषा ही गलत है। हित की, और आनंद की तुम्हारी जो परिभाषा है, वो बड़े नशे के, बड़े बेहोशी के केंद्र से आ रही है, तो तुम्हारी हित की, और आनंद की परिभाषा ही गलत है। मैं यहाँ पर तुम्हें तुम्हारी गलत परिभाषाओं के अनुसार झूठी शान्ति, झूठा आनंद, झूठा हल्कापन देने के लिए नहीं हूँ। मेरा काम है तुम्हारा थर्ममीटर ही ठठीकक कर देना। तुम्हारे पैमाने ही बदल देना।

मैं पूछूँ बताना पिछली बार आनंदित कब हुए थे, तुम बता दोगे। तुम कहोगे, “पिछली बार जब नए फ्लेवर का मटन पिज़्ज़ा उतरा था मार्केट में, और उसमें मैंने अपने वहशी दांत गड़ाए थे, तो आह! आहा! क्या आनंद आया था, पूछिए ही मत!” ये तो तुम्हारी आनंद की परिभाषा है, अब तुम चाहते हो, सच के रास्ते पर भी तुम्हें आनंद मिले। ऐसा आनन्द मिले! नहीं बिलकुल नहीं मिलेगा।

वो वीकेंड की दारू वाला हल्कापन नहीं मिलेगा सच के रास्ते पर। तुम अपनी परिभाषा ठीक करो। तुम अपने शब्दों में सही अर्थ भरो, फिर बात करो।

हल्कापन मिलेगा, असली हल्कापन मिलेगा। इस नए-नए हल्केपन को तुम तभी सम्मान दे पाओगे जब पहले तुम मानोगे कि तुम अध्यात्म से पहले कितने भारी थे।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org

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