आओ तुम्हें जवानी सिखाएँ

आओ तुम्हें जवानी सिखाएँ

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, “जवानी अकेली दहाड़ती है शेर की तरह” — आपकी यह पंक्ति जब से सुनी है, तब से ख़ुद को युवा कहने में शर्म आती है। मुझ में उत्साह की कमी है। वो धार नहीं है जो इस उम्र में होनी चाहिए। किसी भी कर्म में डूबने की कोई प्रेरणा नहीं है। डॉक्टर से मिलता हूँ तो वो कहते हैं — “दवाई लो”; पर मुझे दवाई नहीं लेना। मैं आपके पास आया हूँ, कृपया मुझे सच्चा यौवन सिखाएँ।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org