असंबद्धता स्वभाव है तुम्हारा

जिस दुनिया में हम रहते हैं, इसकी तो प्रकृति ही यह है कि ये किसी की सगी नहीं है। ‘संबद्धता’ जैसी कोई चीज़ हो ही नहीं सकती इस दुनिया में।

आज मैं जिस दफ़्तर में गया था, वहाँ मैंने सैकड़ों लोग देखे, बड़ा दफ़्तर था। वहाँ एक भी ऐसा नहीं था, जो वहाँ बिलौन्ग करता हो, वहाँ से संबद्ध हो। लोग अपने साधे-सधाये रस्ते से चल रहे थे, आ रहे थे, जा रहे थे। किसी का किसी और चीज़ से मतलब ही नहीं था।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org