अपने ही प्रति हिंसा है माँसाहार

माँस खाना कैसा भी नहीं है — न अच्छा है, न बुरा है — खा सकते हो, कुछ भी खा सकते हो। बहुत-बहुत पुराने जो मनुष्य के पुरखें थे, वो माँसाहारी ही थे। आज भी तुम्हारे दाँतों की बनावट ऐसी है कि वो माँस को चीर सकती है, वो उन्हीं पुरखों से आ रही है। आज भी तुम्हारे पेट की, आँतों की, और आन्तरिक रसों की बनावट कुछ ऐसी है कि वो माँस को पचा सकती है। वो भी उन्हीं पुरखों से ही आ रही है। हम सब वंशज माँसाहारियों के ही हैं।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org