अपने अंधकार से दूसरों को कैसे रौशन कर पाओगे

पंडित और मशालची, दोनों सूझत नांहि

औरन को करै चांदना, आप अँधेरे मांहि

~ संत कबीर

आचार्य प्रशांत: चिराग की रोशनी तो फिर भी उसकी अपनी है, यहाँ तो मशाल पकड़ी हुई है, जो तुम्हारा हिस्सा भी नहीं। तुम मशाल नहीं हो, तुमने तो मशाल उठा ली है बस, और दावा तुम्हारा ये है कि तुम दुनिया रोशन कर रहे हो। उस मशाल का नाम कुछ भी हो सकता है, कबीर, अष्टावक्र, कृष्ण, और दावा क्या है? दुनिया रोशन हो रही है। और मशाल के नीचे क्या है?

आँखें हमेशा बाहर को देखती हैं। मशालची देखेगा अगर, तो उसे रोशनी ही रोशनी दिखाई देती है क्योंकि किधर को देख रहा है? और उसकी सारी कोशिश यही है कि और दूर तक रोशनी फैले क्योंकि किधर को देख रहा है? नीयत में कोई खोट नहीं है मशालची की, जो दूसरों को इतना देना चाह रहा हो, वो ये चाहेगा तो नहीं कि मैं खुद अँधेरे में रहूँ। लेकिन आदत कुछ ऐसी है मन की और इन्द्रियों की, कि वो अंतर्मुखी हो ही नहीं पाते। आदत लगी हुई है आँखों को बाहर को देखने की। करोड़ों साल पुरानी आदत है। आदत लगी हुई है मन की, ज्ञान में जीने की, सूचना में जीने की और समस्त सूचना, बाहरी है। खूब जानना है, समझना है कि वहाँ क्या चल रहा है, किसको कितना मिल गया।

“जिसका हो दीप वो सुख नहीं पाए, जोत दिये की दूजे घर को जलाये”

प्रकाश आपके भीतर ही है, पर वो प्रकाश आपको नहीं उपलब्ध है। आपकी आँखों से पूरा जग प्रकाशित हो रहा है पर अपना ही मन नहीं प्रकाशित हो रहा। आपको क्या लगता है कि ये रोशनी सूरज की रोशनी…

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org