अनंत चेतना का महासागर

मुझमें ब्रह्माण्ड की काल्पनिक तरंगों को उठने या गिरने दो। मैं जो अनंत चेतना का महासागर हूँ, मुझमें कोई वृद्धि या कमी नहीं होती।
—योगवासिष्ठ सार

आचार्य प्रशांत: "अनंत चेतना का महासागर हूँ मैं।” ये जो 'अनंत चेतना' है, इसको थोड़ा समझना पड़ेगा। चेतना में अनंतता दो तरह की होती है: एक विस्तार की, एक गहराई की। विस्तार की जो अनंतता है, उसे कहते हैं मन की कल्पनाशीलता, ‘जहाँ न जावे रवि, वहाँ जावे कवि’—ये चेतना की अनंतता ही है। कवि ऐसी-ऐसी बातें सोच लाएँगे कि पूछो मत। और सोच का कोई अंत नहीं, तुम सोचे जाओ, सोचे जाओ।

--

--

आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org