अतीत की असफलताओं का क्या करूँ?

जो पुराना दिन बीत जाता है वह पूरी तरह बीत जाता है। वह अपने कोई निशान छोड़कर नहीं जाता। अस्तित्व को देखो, दुनिया को देखो,जो बीत गया वह बीत ही गया। अब उसका कुछ भी बचा नहीं है।

लेकिन हमारा जो मन है वह उसको पकड़ कर के बैठा रहता है। सिर्फ असफलता को ही नहीं, सफलता को भी पकड़ कर बैठा रहता है। जब मैं कह रहा हूँ कि पुरानी असफलता कहाँ बची है, तो मैं तुमसे यह भी कह रहा हूँ कि पुरानी सफलता कहाँ बची है? और मेरे लिए सफलता की…

--

--

आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org