अगर कठपुतली हैं हम सभी, तो डोर किसके हाथ है?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, यदि जब सत्य पूर्ण है तो उसी स्रोत से जब चेतना आती है तो वो अपूर्ण क्यों है?

आचार्य प्रशांत: चेतना अपूर्ण होती नहीं है। चेतना के पास चुनाव होता है पूर्ण या अपूर्ण होने का। वास्तव में सत्य और चेतना अलग-अलग नहीं है। सत्य ही जब अपूर्ण होने के अपने विकल्प का चुनाव कर लेता है तो वो साधारण चेतना कहलाता है। सत्य तो अद्वैत है, तो माने सत्य के अलावा तो कुछ हो नहीं सकता न।

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आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant

रचनाकार, वक्ता, वेदांत मर्मज्ञ, IIT-IIM अलुमनस व पूर्व सिविल सेवा अधिकारी | acharyaprashant.org